Marketing- An Introduction, Concept, Mix

उद्देश्य

इस इकाई के अध्ययन के बाद आप इस योग्य हो सकेंगे कि:

  1. विपणन का अर्थ व विशेषताएँ जान सकें ।
  2. विपणन अवधारणाओं व सिद्धांत की व्याख्या कर सकें।
  3. विपणन मिश्र के घटक का वर्णन कर सकें।

प्रस्तावना

प्रारंभिक समय में जब विपणन की अवधारणा नही थी, तब सिर्फ बाजार में होने वाले क्रय-विक्रय को ही विपणन माना जाता था। सर्वप्रथम वस्तु विनिमय ही किया जाता था जब मुद्रा प्रचलित नही थी। जैसे:- अनाज के बदले वस्त्र खरीदना, लकड़ियों के बदले में सब्जियाँ खरीदना आदि।

प्रारम्भिक समय में उपभोक्ता अपनी आवश्यकताओं की वस्तुएँ स्वयं ही उत्पादित कर लेता था जितना उत्पादन हुआ उसका उपभोग कर लिया जाता था। जिस वस्तु का उत्पादन उपभोक्ता नहीं कर पा रहा था उसे उस व्यक्ति से लेने लगे, जो उसका उत्पादन स्वयं के लिए करता चला आ रहा था। इस तरह माँग बढ़ने से उत्पादन बढ़ा, सर्वप्रथम वस्तु विनिमय उसके उपरांत मुद्रा का प्रचलन बढ़ने पर मौद्रिक विनिमय प्रारंभ हुआ और विपणन प्रक्रिया प्रारंभ हुई।

विपणन: अर्थ एवं परिभाषाएँ

विपणन को शुरुआती दौर में सिर्फ वस्तुओं के क्रय-विक्रय तक ही सीमित माना जाता था जैसे-जैसे बाजार में परिवर्तन आया नई अवधारणा बनी। विपणन की परिभाषाएँ निम्नलिखित है:-

‘‘विपणन उन व्यवसायिक क्रियाओं का निष्पादन करना है जो उत्पादक से उपभोक्ता के बीच वस्तुओं तथा सेवाओं के प्रवाह का नियमन करती है।‘‘

अमेरिकन मार्केटिंग ऐसोसिएशन:-

‘‘विपणन में क्रय-विक्रय दोनों ही क्रियाएँ सम्मिलित होता है।‘‘

पायले के अनुसार:-

‘‘विपणन उन समस्त साधनों एवं क्रियाओं से संबंधित है जिनसे वस्तुएँ एवं सेवाएँ उत्पादक से उपभोक्ता तक पहुँचाती हैं।‘‘

व्हीलर के अनुसार:-

ये परिभाषाएँ पूर्व अवधारणाओं पर आधारित है जब उत्पादन को अधिक महत्वपूर्ण माना जाता था, तब विपणन का आंकलन नही होता था किंतु वर्तमान में प्रतिस्पर्धा बढ़ती ही जा रही है तथा बाजार में नित नये परिवर्तन हो रहे हैं तो परिभाषाओं में भी नई सोच का विलय हुआ है।

नवीन परिभाषाएँ:-

‘‘विपणन उन समस्त आपसी प्रभावकारी व्यावसायिक क्रियाओं की सम्पूर्ण प्रणाली है, जो विद्यमान एवं भावी ग्राहकों की आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने वाले उत्पादों तथा सेवाओं का नियोजन करने मूल्य निर्धारण करने प्रचार-प्रसार करने तथा वितरण करने के लिए की जाती है।‘‘

विलियम जेस्टेन्टन के अनुसार:-

‘‘समाज को जीवन स्तर प्रदान करना ही विपणन है।‘‘

प्रो. पाल मजूर के अनुसार:-

‘‘विपणन वह मानवीय क्रिया है जो विनिमय प्रक्रियाओं के द्वारा आवश्यकताओं एवं इच्छाओं की संतुष्टि के लिए की जाती है।‘‘

फिलिप कोटलर के अनुसार:-

‘‘विपणन वह प्रबंधकीय प्रक्रिया है जिसके द्वारा उत्पादों का बाजारों से मिलान किया जाता है तथा उसी के अनुरुप स्वामित्व का हस्तांतरण किया जाता है।‘‘

कण्डिक स्टिल तथा गोवोनी के मतानुसार:-

‘‘विपणन उपभोक्ता की आवश्यकताओं को खोजने एवं उनको वस्तुओं तथा सेवाओं में परिवर्तित करने की क्रिया है। तद्ुपरान्त अधिकाधिक उपभोक्ताओं द्वारा वस्तुओं एवं सेवाओं से अधिकाधिक आनंद प्राप्त करना है।‘‘

हैन्सन के अनुसार:-

विपणन को अच्छे से समझने के लिए इससे जुड़े कुछ अन्य शब्दों को जानना भी आवश्यक है जिनसे मिलकर विपणन बनता है वे शब्द हैं

  1. बाजार
  2. इच्छाएँ व आवश्यकताएँ
  3. उत्पाद का सृजन
  4. उपभोक्ता के अनुसार मूल्य
  5. विनिमय पद्धति

बाजार परिचय

सामान्य रुप से बाजार उस स्थान को माना जाता है जहाँ क्रेता एवं विक्रेता किसी वस्तु व सेवा के विनिमय के लिए आदान-प्रदान करते हैं या अन्य स्वरुप मैं बाजार को उस स्थान के रुप में लिया जाता है जो उत्पाद के अनुसार पहचाना जाता है जैसे कपड़ा बाजार, अनाज मंडी, भौगोलिक बाजार के अनुसार (राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर बाजार) ग्राहकों के प्रकार अनुसार (थोक व फुटकर बाजार)।
परन्तु आज के बदलते परिवेश के आधार पर बाजार के मायने और भी व्यापक हो गया है जैसे एक ही वस्तु विभिन्न स्वरुपों तथा गुणों के साथ उपलब्ध हैं तो उदारणार्थ पंखों का बाजार, साईकिलों का बाजार, कारों का बाजार आदि।

विपणन की विशेषताएँ व व्यवहार या प्रकृति

  1. आवश्यकता एवं अपेक्षाएँ:- विपणन एक ऐसी क्रिया हैं जो व्यक्ति व समूहों को उनकी अपेक्षाओं से अवगत कर उसे क्रय करने में सहायता प्रदान करती है। क्योंकि जब कोई व्यक्ति किसी वस्तु की आवश्यकता रखता है जब तक वह पूर्ण ना हो वह असंतुष्ट रहता है और उसी वस्तु की जानकारी एकत्रित करता है।
    अपेक्षाएँ मानव की आधारभूत इकाई है, अपेक्षाएँ ही है जो आवश्यकताओं में परिवर्तित होती है परंतु सभी अपेक्षाएँ आवश्यकताओं में परिवर्तन नही होती हैं जितनी परिवर्तित होती है उसमें विपणन का महत्वपूर्ण सहभागिता होती है।
  2. यह मानवीय प्रक्रिया हैं:- विपणन की गतिविधि मनुष्यों द्वारा मनुष्यों के लिए किया जाता है साथ ही साथ वर्तमान में इसमें बहुत से उपकरणों का प्रयोग किया जाने लगा है परंतु ये उपकरण मानव द्वारा चलित ही होते हैं।
  3. सृजनात्मक:- विपणन सृजनात्मक क्रिया है जिसमें विभिन्न प्रकार कि सृजनात्मक क्रियाएँ की जाती है जिससे वस्तु की गुणवान तथा मूल्यवान हो जाए विपणन की सृजनात्मक क्रियाएँ निम्नलिखित हैं:-
    1. उत्पाद रुप सृजन:- विपणन उपभोक्ताओं का विश्लेषण करने के बाद उनकी आवश्यकताओं के आधार पर उत्पाद के रुप व आकार में सृजनात्मक लाता है तथा उसकी उपयोगिता बढ़ाता है जैसे:- गेहुॅ से आटा, सूजी, व मैदा बनाना।
    2. मूल्य उपयोगिता:- समय तथा वार्तावणीय परिस्थितियों के अनुसार आवश्यक वस्तुओं का उचित समय पर उपलब्ध करवाना जैसे:- ठंड में ऊनी कपड़े, गर्मी में कूलर व ए.सी.।
    3. ज्ञान उपयोगिता:-वस्तु को खरीदने से पहले उससे संबंधित जानकारी, उपयोगिता तथा खरीदने के बाद उपयोग करने का तरीका सावधानियाँ रखने की जानकारी प्रदान करना विपणन के ज्ञान उपयोगिता सृजनात्मता में आता है।
    4. स्थान सृजनात्मकता:- आवश्यकतानुसार उत्पाद को उस स्थान तक पहुँचाना। मांग के आधार पर स्थान पर वस्तु को पहुँचाना स्थान सृजनात्मक माना जाता है जैसे:- खेतों की सब्जियाँ बाजार तक पहुँचाना।
    5. स्वामित्व सृजनात्मकता:- उत्पादों का विक्रय उपरांत उचित हस्तांतरण की प्रक्रिया भी स्वामित्व सृजनात्मकता माना जाता है। जैसेः- मारुती (कार उत्पादक द्वारा) के उत्पादन स्थान से उपभोक्ता तक पहुंचा कर हस्तातरण करना।
  4. विनिमय विपणन का आधार है:- वस्तुओं व सेवाओं के लेन-देन को विनिमय कहा जाता है। इसके बिना विपणन क्रिया संभव नहीं है। अतः विपणन का आधार, विनिमय होता है। मूल्य के बदले वस्तु या सेवाओं का लेन-देन क्रिया विपणन है जो उत्पादक व उपभोक्ता के बीच होती है।
  5. विपणन विज्ञान एवं कला दोनों है:- सालों के अनुभवों व खोज के द्वारा निकलने वाले प्रतिफलों को विज्ञान माना जाता है। विज्ञान में नए-नए अनुसंधानों द्वारा सालों के अनुमानों को ध्यान में रखकर सिद्धान्त बनाये जाते है, ठीक उसी प्रकार विपणन के नियम व सिद्धान्त सालों से चले आ रहे हैं। बाजार, अर्थव्यवस्था, उपभोक्ताओं पर किये जाने वाले अनुसंधानों को
    आधार मान कर बनाये जाते हैं।
    दूसरी तरफ किसी कार्य को सर्वोत्तम रुप में पूर्ण करना कला माना जाता है। कार्य की गुणवत्ता दिन-प्रतिदिन बढ़ाई जाती हैं, विपणन में भी उपभोक्ता की आवश्यकता अनुसार निरंतर गुणवत्ता में बढ़ोत्तरी तथा कार्य को कुशलता से करने की आवश्यकता होती हैं। विज्ञान व कला की प्रक्रियाओं का सममिलन विपणन में होने की वजह से कहा जाता है कि विपणन भी विज्ञान व कला है।
  6. विपणन विक्रय से भिन्न हैं:- विक्रय तथा विपणन में अंतर होता है। विक्रय विपणन का एक हिस्सा मात्र है। विक्रय में सिर्फ वस्तुओं व सेवाओं का पूर्ण निर्धारित मूल्य देकर आदान-प्रदान सम्मिलित हैं जब कि विपणन में वस्तुएँ तथा सेवाएँ उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं की जानकारी प्राप्त कर उसी गुणवत्ता का उत्पाद बनाया जाता है तथा विक्रय होने के बाद उसकी संतुष्टि तथा किसी कमी का ज्ञान रखा जाता है तब विपणन की प्रक्रिया पूर्ण होती है।
  7. गतिशील प्रक्रिया:- विपणन की प्रक्रिया कभी रुकती नही अनवरत् चलित रहती है। विपणनकर्ता बाजार की परिवर्तित होने वाली ग्राहकों की आवश्यकताओं फैशन, पसंद, रुचियों पर

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