Cost Accounting-Introduction and Basic Concepts || लागत लेखांकन—परिचय और मूल अवधारणाओं

उद्देश्य

इस पोस्ट का अध्ययन करने के पश्चात आप इस योग्य हो सकेंगे की आप यह समझ सकें :-

Table of Contents

  1. लागत लेखांकन Cost Accounting क्या है ॽ
  2. लागत लेखांकन की विशेषताएं‚ कार्य प्रकृति व क्षेत्र क्या है ॽ
  3. वित्तीय लेखांकन की कमियों क्या है ॽ
  4. वित्तीय लेखांकन की कमियों कितने प्रकार की होती है।
  5. लागत लेखांकन के लाभ व सीमाऐं क्या है ॽ

प्रस्तावना

उत्पादन एवं निर्माण सम्बन्धी लेखों को इस प्रकार लिखना, कि सही लागत का पता चल सके, यही लागत लेखा है। लागत लेखांकन के अन्तर्गत किसी वस्तु की प्रति इकाई लागत तथा कुल लागत ज्ञात की जाती है तथा लागत विश्लेषण किया जाता है और उत्पादन की विभिन्न अवस्थाओं में लागत ज्ञात की जाती है।

सबसे पहले प्रत्यक्ष लागतों का योग करके मूल लागत ज्ञात की जाती है। तत्पश्चात् अप्रत्यक्ष लागतों का क्रमशः योग करके कारखाना लागत, उत्पादन लागत, विक्रय लागत तथा कुल लागत ज्ञात की जाती है। कुल लागत में अपेक्षित लाभ जोड़कर विक्रय मूल्य ज्ञात किया जाता है, साथ ही कुल लागत में उत्पादित इकाइयों का भाग देकर प्रति इकाई लागत ज्ञात की जाती है।

लागत लेखांकन में न केवल वस्तुओं की लागत ज्ञात की जाती है अपितु सेवाओं की लागत भी ज्ञात की जाती है। परिचालन लागत विधि द्वारा सेवाओं की लागत ज्ञात की जाती है।

प्रमाप लागत से लेखांकन में मितव्ययिताओं को प्राप्त किया जाता है। प्रक्रिया लागत विधि द्वारा प्रत्येक प्रक्रिया पर मितव्यता प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है तथा लागत नियन्त्रण की जाती है।

ठेका लागत विधि द्वारा प्रत्येक ठेके के लागत व लाभ का पता लगाया जाता है।

लागत लेखांकनः परिभाषा

‘‘लागत ज्ञात करने की प्रविधि व प्रक्रिया को लागत लेखा कहते है।‘‘

“Cost accounting is the technique and process of ascertaining cost.”  – I.C.W.A Landon

’’लागत लेखांकन का मुख्य उद्देश्य उत्पादन की इकाई लागत निकालना है।‘‘

“The primary object of cost accounting is to find out the cost of unit production.”  – N.N. Sarkar

निष्कर्ष

लागत लेखा वह लेखा व्यवस्था है जिसके अन्तर्गत लागत का विश्लेषण किया जाता है और उत्पादन की विभिन्न अवस्थाओं में लागत ज्ञात की जाती है।

लागत लेखांकन: विशेषता व प्रकृति (Characteristics and Nature of Cost Accounting)

  1. लागत लेखांकन विज्ञान व कला दोनों होता हैः लागत लेखांकन लागत को ज्ञात करने की वैज्ञानिक व सर्वाेत्तम विधि बताती है, अतः विज्ञान व कला दोनों ही है।
  2. लेखा कार्य का मुख्य-भावः लागत लेखांकन, लेखा-कर्म के मुख्य-भाव अर्थात दोहरे लेखे प्रणाली पर ही आधारित होते है।
  3. सभी व्ययों का लेखा वैज्ञानिक एवं उचित रीति सेः प्रत्येक व्यय लागत लेखांकन में वैज्ञानिक व उचित रीति से लिखे जाते है। उदाहरण के लिए सबसे पहले सामग्री का लेखा होता है, तत्पश्चात् श्रम का, क्रमशः प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष व्ययों का।
  4. वस्तुओं व सेवाओं की कुल लागत मालूम होनाः लागत-विवरण व लागत-पत्र द्वारा हम वस्तुओं की कुल लागत ज्ञात करते है तथा संचालन लागत पद्धति द्वारा हम सेवाओं की कुल लागत ज्ञात करते है।
  5. प्रत्येक इकाई की लागत बतानाः कुल लागत में उत्पादित इकाईयों की संख्या का भाग देकर प्रत्येक इकाई की लागत ज्ञात की जाती है।
  6. कार्य की प्रगति में लागतः लागत लेखांकन हमें न केवल कच्ची सामग्री की लागत और न ही निर्मित वस्तु की लागत ज्ञात करना सिखाती है, बल्कि अर्द्ध-निर्मित (Work in Progress) वस्तुओं के लागत को ज्ञात करना भी सिखाती है।
  7. वित्तीय लेखांकन की पूरकः लागत लेखांकन, वित्तीय लेखांकन की पूरक होती है। यह लेखांकन वित्तीय लेखांकन का ही एक प्रमुख एवं महत्वपूर्ण हिस्सा है।
  8. प्रबन्धकों के लिए सहायकः लागत लेखांकन नियोजन, निर्णयन एवं नियन्त्रण में प्रबन्धकों के लिए सहायक होता है।

लागत लेखांकन: कार्य एवं क्षेत्र

  1. कुल लागत व प्रति इकाई लागत ज्ञात करनाः लागत लेखांकन के अन्तर्गत सामग्री, श्रम, प्रत्यक्ष व्यय व अप्रत्यक्ष व्यय का योग करके कुल लागत तथा प्रति इकाई लागत ज्ञात की जाती है।
  2. विक्रय मूल्य का निर्धारणः कुल लागत में इच्छित लाभ को जोड़कर विक्रय मूल्य का निर्धारण किया जाता है।
  3. निविदा मूल्य का निर्धारण: चूंकि लागत लेखांकन के अन्तर्गत कुल लागत तथा प्रति इकाई लागत ज्ञात की जाती है, अतः निविदा मूल्य के निर्धारण में सुविधा रहती है।
  4. लागत पर नियन्त्रणः प्रमाप लागत का निर्धारण करके प्रतिकूल विचरण के कारणों को ज्ञात किया जाता है तथा उन्हें दूर करने के उपाय किये जाते है। इसी तरह बजट बनाकर बजटरी नियन्त्रण किया जाता है।
  5. लाभदायकता का विश्लेषणः लागत लेखांकन में विभिन्न उत्पादों, विभागों व प्रक्रियाओं आदि की तुलनात्मक लाभदायकता ज्ञात की जाती है। हानिप्रद उत्पादों व विभागों को बन्द करने में सुविधा होती है।
  6. प्रबन्धकीय सूचना पद्धति में सुधार एवं वृद्धिः इस के अन्तर्गत प्रबन्धकीय निर्णयन के लिए उपयोगी सूचनाएं उपयुक्त प्रारूपों में निर्धारित समयान्तर पर अथवा आवश्यकता पड़ने पर तैयार की जाती है।

लेखांकन के प्रकार (Kinds of Accounting)

लेखांकन मुख्यतः 3 तीन प्रकार का होता है

  1. वित्तीय लेखांकन (Financial Accounting)
  2. लागत लेखांकन (Cost Accounting)
  3. प्रबंधन लेखांकन (Management Accounting)

1- वित्तीय लेखांकन (Financial Accounting)

वित्तीय लेखों के अन्तर्गत जर्नल, लेजर आदि के द्वारा तलपट (Trial Balance), अन्तिम खाते (Final Accounts) तथा चिट्ठे (Balance sheet) तैयार किये जाते है, ताकि एक व्यवसाय अपनी वित्तीय स्थिति ज्ञात कर सके। ये व्यवसाय की सामान्य स्थिति प्रकट करते है तथा पूँजी व सम्पत्ति, लेनदारी एवं लाभ-हानि चित्रित करते है।

2- लागत लेखांकन (Cost Accounting)

लागत लेखों में उत्पादन व बिक्री सम्बन्धी सभी व्ययों का विश्लेषण किया जाता है, जिससे प्रत्येक इकाई की लागत और उत्पादन की कुल लागत ज्ञात हो सके। यदि उत्पादक अनेक वस्तुओं का उत्पादन करना चाहता है तो प्रत्येक वस्तु का मूल्य निर्धारित करने से पूर्व उसकी उत्पादन लागत ज्ञात करनी होगी उत्पादन लागत, लागत लेखों द्वारा ही ज्ञात हो सकती है।

यदि उत्पादक अनेक वस्तुओं का उत्पादन करता है तो कौन सा कार्य लाभदायक है और कौन सा कम लाभदायक है, यह लागत लेखे द्वारा ही ज्ञात हो सकता है।

जो उत्पादन अधिक लाभ देते है उनका उत्पादन बढ़ाया जा सकता है और जो हानिप्रद या कम लाभदायक है, उन्हें संकुचित किया जा सकता है। इस प्रकार व्यवसायी को अपने लाभों में वृद्धि करने में सहायता मिलती है। लागत लेखों द्वारा सामग्री, श्रम तथा उत्पादन व बिक्री के व्ययों को नियमित व नियन्त्रित किया जाता है, इससे उत्पादन लागत कम होती है।

3- प्रबंधन लेखांकन (Management Accounting)

प्रबन्ध लेखांकन, लागत लेखे से अगली सीढ़ी है। प्रबन्धक भविष्य के लिए नियोजन करते है तथा भावी नीतियाॅ निर्धारित करते है। प्रबन्धकों का मुख्य उद्देश्य लागत को नियन्त्रित करने तथा लाभों का अधिकतम करना होता है। वे कोषों व पूँजी की उचित व्यवस्था व भविष्य के लिए नियोजन करते है। इसके लिए बजटरी नियन्त्रण, प्रमाप लागत, सीमान्त लागत व सम-विच्छेद बिन्दु, कोष प्रवाह विवरण तथा अनुपात विश्लेषण आदि तकनीक अपनानी पड़ती है।

अतः लागत को नियन्त्रित करने, नियोजन करने व नीति-निर्धारण करने में जो लेखांकन पद्धति काम में लायी जाती है, वह प्रबन्धकीय लेखांकन कहलाती है।

वित्तीय लेखांकन के दोष तथा असुविधाए

  1. व्यय सम्बन्धी ज्ञान अपूर्ण होनाः उत्पादन की प्रत्येक विधि पर क्या व्यय किया गया है, किस स्थान पर आवश्यकता से अधिक व्यय हो रहा है, प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष व्ययों का उचित वर्गीकरण, आदि जानकारी वित्तीय लेखांकन से नहीं हो पाती है। उचित सूचना के अभाव में कार्य क्षमता वृद्धि नहीं होती। एक व्यवसाय का दूसरे व्यवसाय से तुलना नहीं हो पाता।
  2. सामग्री के लेखों पर कम ध्यान दिया जानाः वित्तीय लेखांकन में सामग्री के लेखों पर कम ध्यान दिया जाता है। अधिकतर रोकड़ की प्राप्ति व व्यय पर ध्यान दिया जाता है। प्रति इकाई पर कितनी सामग्री लगी, इसका ज्ञान प्राप्त नहीं होता है।
  3. लाभ की कमी का कारण ज्ञात न होनाः लाभ के घट-बढ़ का उत्तर वित्तीय लेखांकन नहीं दे पाते है।
  4. सही लागत ज्ञात न होनाः वित्तीय लेखांकन लाभ तो बताती है, परन्तु सही लागतें नहीं। सही लागत का ज्ञान हुए बिना विक्रय मूल्य ठीक से निश्चित नहीं किया जा सकता है।
  5. निविदा के मूल्य निर्धारण में असुविधाः वित्तीय लेखांकन के द्वारा निविदा मूल्य निर्धारण में असुविधा होती है, किन्तु लागत लेखों में नहीं। लागत लेखों मंे प्रति इकाई सामग्री व्यय, श्रम व्यय, प्रत्यक्ष व्यय व अप्रत्यक्ष व्यय ज्ञात हो जाता है, अतः निविदा मूल्य की गणना सुगमता से हो जाती है।
  6. भविष्य की योजनाओं में सहायक न होनाः वित्तीय लेखांकन उत्पादन घटने या बढ़ने की उत्तरदायी कारणों को प्रकट नहीं करते, अतः यह भविष्य की योजना बनाने में सहायक नहीं होते।
  7. बाहरी एजेन्सियों के वांछित रिपोर्ट नहींः बाहरी एजेन्सियों जैसे बैक, व्यापारिक संघ और सरकार आदि को वांछित रिपोर्ट व्यापारिक लेखांकन द्वारा नहीं दी जा सकती है। यह कार्य लागत लेखंाकन द्वारा आसानी से पूर्ण की जा सकती है।
  8. अपव्यय में कमी का अभावः विभिन्न उत्पादन विभागों पर किये गये व्ययों की आपस में तुलना करके अपव्यय में कमी की जा सकती है तथा एक वर्ष के उत्पादन व्ययों की तुलना अन्य वर्षाें के उत्पादन व्ययों से करके अपव्यय कम किया जा सकता है।

निष्कर्ष

वित्तीय लेखांकन के कमियों, असुविधाओं व दोषों को दूर करने के लिए ही लागत-लेखांकन की व्यवस्था की गई। लागत लेखांकन, वित्तीय लेखांकन का पूरक होता है।

उदाहरण — यहॉ क्लिक करें ->

लागत लेखांकन व प्रबंधन लेखांकन में अन्तर

क्र० सं०आधारलागत लेखांकनप्रबंधन लेखांकन
1.क्षेत्रलागत लेखांकन का क्षेत्र सीमित है।प्रबन्ध लेखांकन का क्षेत्र व्यापक है, क्योंकि इसमें वित्तीय लेखांकन, लागत लेखांकन व वित्तीय प्रबन्ध आदि के सभी पहलू आ जाते है।
2.आंकड़ों के श्रोतलागत लेखांकन के लिए आंकड़े वित्तीय लेखों से लिए जाते है।प्रबन्ध लेखांकन के लिए आकड़े वित्तीय लेखों तथा लागत लेखों से लिये जाते है।
3.आकड़ों की प्रकृतिलागत लेखांकन के आकड़े वस्तु की लागत से सम्बन्धित होते है।प्रबन्ध लेखांकन के आकड़े लागत व आगम दोनों से सम्बन्धित होते है।
4.बललागत लेखांकन का उद्देश्य वस्तु या सेवा की प्रति इकाई लागत का निर्धारण करना है।प्रबन्ध लेखांकन प्रबन्धकीय क्रियाओं के सफल संचालन हेतु लागत संमको के प्रस्तुतीकरण पर बल देता है।
5.कानूनी अनिवार्यताकुल निर्माणी संस्थाओं में लागत लेखे रखना कानूनी रूप से अनिवार्य है।प्रबन्ध लेखांकन कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है।
6.नियोजनलागत लेखांकन मुख्यतः अल्पकालीन नियोजन से सम्बन्धित है।प्रबन्ध लेखांकन अल्पकालीन तथा दीर्घ कालीन नियोजन से सम्बन्धित है।

लागत लेखांकन व प्रबंधन लेखांकन में अन्तर

लागत लेखों एवं वित्तीय लेखों की तुलना

लागत व वित्तीय लेखों में समानताए

इन दोनों लेखों में निम्नलिखित समानताएं है:

  1. दोनों लेखों के आधार पत्र एक ही होते है। व्यापार में जो बीजक व प्रपत्र प्राप्त होते है और जिनके आधार पर वित्तीय खातों में लेखा किया जाता है उन्हीं पत्रों के आधार पर परिव्यय खातों में लेखा किया जाता है।
  2. दोनों लेखे दोहरा लेखा प्रणाली (Double Entry System) पर आधारित है।
  3. दोनाें ही लेखे व्यवसाय का लाेभ व हानि ज्ञात कराते है।
  4. दोनों ही लेखों में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष सामग्री, श्रम और व्ययों का लेखा रखा जाता है।
  5. लागत लेखे वित्तीय लेखे के पूरक होते है।
  6. दोनों लेखे एक व्यवसायी को भविष्य नीति निर्धारित करने में सहायक होते हैं।
  7. पिछले वर्षाें के उत्पादन व्यय, विक्रय-मूल्य व अर्जित लाभ की तुलना दोनों लेखों से की जा सकती है।

वित्तीय लेखों की बहुत-सी सीमाएं है एवं वित्तीय लेखों की कमियों को दूर करने के लिए ही लागत लेखों का जन्म हुआ है।

लागत एवं वित्तीय लेखों में अन्तर

उपर्युक्त समानताओं के होते हुए भी दोनों प्रकार के लेखों में निम्नलिखित असमानताएं पायी जाती है:

क्र. सं.अन्तर का आधारलागत लेखेवित्तीय लेखे
01.लेखों का प्रयोगये लेखे सेवा प्रदान करने वाली व वस्तु का उत्पादन करने वाली औद्योगिक संस्थाओं द्वारा रखे जाते है जहां कि सेवा व उत्पादन की लागत ज्ञात की जाती है।ये लेखे सभी संस्थाओं द्वारा रखे जाते है, चाहे वे औद्योगिक हो अथवा व्यापारिक।
02.व्ययों का लेखाइसमें लागत के तत्वों से सम्बन्धित सभी लेखे रखे जाते हैं। लागत के तत्व हैं- सामग्री, श्रम व व्यय।इसमें सभी प्रकार के व्ययों जिनमें वित्तीय प्रकृति के व लाभ नियोजन के व्यय सम्मिलित होती है, का लेखा रखा जाता है।
03.लाभ-हानियह उत्पादित वस्तु की लागत ज्ञात करने के पश्चात् उस पर लाभ या हानि ज्ञात कराता है।यह वर्ष के अन्त में लाभ-हानि खाते द्वारा अन्तिम लाभ-हानि बतलाता है तथा चिट्ठे के द्वारा व्यवसाय की आर्थिक स्थिति ज्ञात कराता है।
04.अनुमानित व्ययउत्पादित वस्तु की लागत में जोड़े गये व्यय अनुमानित ही होती है।वित्तीय लेखांकन में व्यय अनुमानित नही, बल्कि यथार्थ होते है।
05.नियन्त्रण का क्षेत्रयह सामग्री तथा स्टोर के निर्गमन व मूल्यांकन पर जितना विशेष नियन्त्रण रखता है उतना रोकड़ पर नहीं।इसमें रोकड़ पर जितना नियन्त्रण रखा जाता है, उतना सामग्री व स्टोर पर नहीं।
06.निविदा मूल्य की गणनाइस लेखे द्वारा चालू वर्ष में किसी वस्तु की पूर्ति करने के लिए निविदा मूल्य निकालना सरल होता है।इस लेखे के द्वारा निविदा मूल्य ठीक-ठाक नहीं निकाला जा सकता है।
07.लागतों की तुलनाइन लेखों के द्वारा एक वर्ष व किसी अन्य अवधि की उत्पादन लागतों की तुलना पिछले वर्ष व पिछली अवधियों की उत्पादन लागतों से की जा सकती है और यदि कोई अन्तर होता है तो उसका कारण ज्ञात किया जा सकता है।इस प्रकार की तुलना सामान्य रूप से भले ही की जा सके, लेकिन व्यक्तिगत् उत्पादित वस्तुओं की लागत कीतुलना नहीं की जा सकती है।
08.विभिन्न विभागों की कार्य कुशलतालागत लेखे के द्वारा उत्पादन के विभिन्न विभागों की कार्यक्षमता व कार्य कुशलता ज्ञात हो जाती है।वित्तीय लेखों के द्वारा विभिन्न विभागों की कार्यक्षमता व कार्यकुशलता ज्ञात नहीं की जा सकती है।
09.श्रम पारिश्रमिक का विश्लेषणये लेखे श्रमिकों को दिये गये कुल पारिश्रमिक के अतिरिक्त पारिश्रमिक सम्बन्धी विश्लेषणात्मक लेखा भी रखते है, जिससे विभिन्न उत्पादनों पर व्यय की गयी पारिश्रमिक राशि ज्ञात हो जाती है और श्रमिकों के कार्यहीन काल व अधिसमय, आदि का भी ज्ञान हो जाता है।इन लेखों से श्रमिकों को दिये गये पारिश्रमिक का ज्ञान हो जाता है, लेकिन उनका विश्लेषणात्मक अध्ययन नहीं किया जाता है।
10.लेखे की स्थितिव्यवसाय के सहायक या गौण लेखे होते हैं।व्यवसाय के प्रधान या प्रमुख लेखे होते हैं।
11.अनिवार्यताये लेखे प्रधानतः प्रबन्धों की आवश्यकताओं को पूरा करने की दृष्टि से रखे जाते है। इनका रखा जाना ऐच्छिक है हालांकि कम्पनी अधिनियम ने कुछ निर्माणी उद्योगों में इनका रखा जाना अनिवार्य कर दिया है।ये लेखे इस प्रकार रखे जाते है कि वे कम्पनी अधिनियम, आय-कर अधिनियम, आदि के अनुरूप हों।
12.अंकेक्षणलागत लेखांकन में कुछ विशिष्टि कम्पनियों के लिए लागत लेखों का अंकेक्षण अनिवार्य है।वित्तीय लेखांकन में सभी कम्पनियों के लिए खातों का अंकेक्षण कराना आवश्यक है।
13.लागतों पर नियन्त्रणलागत लेखे लागतों पर नियन्त्रण रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है।वित्तीय लेखों द्वारा लागत पर नियन्त्रण नहीं किया जा सकता है।
14.विभागीय लाभइसमें प्रत्येक कार्य या विभाग का अलग-अलग लाभ ज्ञात किया जाता है जिससे हानिकारक कार्य या विभाग पर नियन्त्रण किया जा सके।वित्तीय लेखे सम्पूर्ण संस्था के लाभ या हानि को प्रकट करते हैं।

लागत एवं वित्तीय लेखों में अन्तर

लागत लेखांकन के लाभ, महत्व या उपयोगिता

उत्पादकों व प्रबन्धकों को लाभ (Advantages to Producers & Managers)

  1. व्यापार के लाभदायक एवं हानिकारक कार्याें को दिखाता हैः लागत लेखांकन के द्वारा व्यवसाय के लाभदायक एव हानिकारक कार्याें का ज्ञान हो जाता है। अधिकतम लाभ के लिए कम लाभदायक या हानिकारक वस्तुओं का उत्पादन बन्द किया जा सकता है।
  2. सामग्री, श्रम व संयत्र का सर्वाेत्तम प्रयोगः लागत लेखांकन में सामग्री क्रय करने, स्टोर्स में सुरक्षित रखने तथा विभिन्न विभागों को नियमित करने की क्रिया पर कड़ा नियन्त्रण रखा जाता है, इससे सामग्री की चोरी व दुरूपयोग पर नियन्त्रण तथा उत्पादन में मितव्ययिता रहती है। श्रमिकों को योग्यतानुसार कार्य, प्रशिक्षण व पारिश्रमिक दिया जाता है। यंत्रों के उचित प्रयोग व नवीनीकरण पर ध्यान दिया जाता है।
  3. उत्पादन लागत का विश्लेषण व वर्गीकरण करके तुलनात्मक अध्ययनः लागत लेखांकन में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष व्ययों का विश्लेषण व वर्गीकरण किया जाता है गत वर्ष से तुलना किया जाता है जहाॅ उत्पादन लागत अधिक होता है, वहाॅ कम करने का प्रयास किया जाता है।
  4. उचित विक्रय-मूल्य निर्धारणः उचित लागत-मूल्य ज्ञात हो जाने के कारण उचित विक्रय मूल्य निर्धारण में सुविधा रहती है।
  5. अनुमान मूल्य व टेण्डर मूल्य का निर्धारणः गत वर्ष के लागत लेखों के आधार पर वर्तमान लागत मूल्य, अनुमान मूल्य व टेण्डर मूल्य के निर्धारण में सुविधा रहती है।
  6. लाभ तथा हानि की जानकारीः लागत विश्लेषण के कारण लाभ वृद्धि या कमी किन कारणों से हुई, इसकी जानकारी हो जाती है।
  7. नीति-निर्धारण में सहायताः भविष्य के लिए नीति-निर्धारण जैसे किस वस्तु के उत्पादन में विस्तार करना है तथा किस वस्तु के उत्पादन में कमी करना है, इसकी भी जानकारी लागत लेखों से हो जाती है।
  8. प्रमाप लागत एवं बजटरी नियन्त्रण पद्धतियों का उपयोग: प्रमाप लागत निर्धारण व उसका वास्तविक लागत से तुलना करके अनुकूल या प्रतिकूल विचरण का पता लगाया जाता हैं। बजटरी नियन्त्रण में प्रत्येक विभाग के बजट का निर्धारित कर दिया जाता है। प्रत्येक विभाग पूर्व निर्धारित बजट व लक्ष्य के अनुसार कार्य करता है।
  9. मन्दी कला में उपयोगिताः लागत लेखांकन की उपयोगिता मन्दी काल में भी देखने को मिलती है। परिवर्तनशीलता के आधार पर लागत दो प्रकार के होती है स्थायी लागत व परिवर्तनशील लागत। मन्दी काल में परिवर्तनशील लागत भी मिलती रहे, तो उत्पादन को जारी रखा जा सकता है।
  10. लाभ-हानि विवरण किसी भी समय तैयार करनाः लागत लेखे के आधार पर लाभ-हानि विवरण किसी भी समय बनाया जा सकता है। यदि किसी उत्पादन कार्य या विभाग पर हानि हो रही है तो उसे तुरन्त बन्द किया जा सकता है।
  11. वित्तीय लेखों का सहायकः लागत लेखे वित्तीय लेखों के सहायक पूरक होते हैं। यह वित्तीय लेखों की कमियों को दूर करता है और उन पर नियन्त्रण रखता है।
  12. उत्पादन या क्रय निर्णयः लागत लेखों के आधार किसी वस्तु उत्पादन किया जाय या बाजार से खरीदा जाये, इसका निर्णय भी लिया जा सकता है।

कर्मचारियों को लाभ (Advantages to Employees)

लागत लेखांकन के अन्तर्ग त कर्मचारियों तथा श्रमिकों को योग्यता व इच्छानुसार कार्य दिया जाता है। इससे कार्य की गुणवत्ता व श्रमिकों के पारिश्रमिक में वृद्धि होती है। प्रमाप का निर्धारण व पुरस्कार तथा दण्ड (Reward and Punishment) नीति अपनायी जा सकती है।

विनियोक्ताओं व ऋणदाताओं को लाभ (Advatanges to Investors and Creditors)

विनियोक्ता व ऋणदाता ऐसी संस्था में निवेश करते है, जिसकी लाभार्जन क्षमता अच्छी हो। लाभार्जन क्षमता सम्बन्धी जानकारी लागत लेखों से आसानी से प्राप्त हो जाती है।

उपभोक्ताओं को लाभ (Advantages to Consumers)

लागत लेखा द्वारा उत्पादन लागत कम करने का व किस्म में सुधार का प्रयास किया जाता है अतः उपभोक्ताओं को सही मूल्य पर सही वस्तु मिल जाती है। लागत लेखों के आधार पर उत्पादक अपने द्वारा मांगे जाने वाले मूल्य का औचित्य सिद्ध कर सकते है।

राष्ट्र को लाभ (Advantages to Nation)

उत्पादन कार्य बढ़ने से उत्पादन कर में वृद्धि होती है। अतः सरकारी आय में वृद्धि होती है। लागत लेखा द्वारा सरकार परियोजनाओं की लागत का अनुमान लगा सकती है। सरकार बजटरी नियन्त्रण पद्धति द्वारा विभिन्न विभागों का बजट व लक्ष्य निर्धारण कर सकती है। प्रमाप लेखांकन द्वारा व्ययों को नियन्त्रित किया जा सकता है। शून्य आधार बजटन द्वारा सरकारी व्ययों पर नियन्त्रण किया जा सकता है। लागत प्लस (Cost plus) के आधार पर ठेका दिया जाता है। अतः लागत लेखांकन राष्ट्र के लिए भी उपयोगी होता है।

लागत लेखांकन की सीमाएं

  1. व्यापारिक उपक्रमों में लागू नहींः लागत लेखांकन की उपयोगिता निर्माणी व्यवसाय में ही होती है व्यापारिक उपक्रमों में नही।
  2. अनुमानों पर आधारितः लागत लेखों में अप्रत्यक्ष व्यय (Overheads) अनुमान पर ही आधारित होते है।
  3. वास्तविक मद शामिल नहीःं वास्तविक मद वित्तीय लेखांकन में दिखाये जाते है।
  4. सीमान्त लागतः सीमान्त लागत का आशय परिवर्तनशील लागत से हैं। स्थिर लागत से नहीं। कुल लागत भ्रमपूर्ण हो जाती है।
  5. विभिन्न रीतियाॅः स्टाक मूल्यांकन, निर्गमन व श्रम भुगतान की विभिन्न रीतियां है।

लागत केन्द्र तथा लागत इकाई

लागत केन्द्र

आई.सी.डब्ल्यू.ए.आई. इण्डिया के लागत लेखांकन मानक-1 (CAS-1) के अनुसार, ‘‘लागत केन्द्र से आशय लागत लेखांकन की ऐसी इकाई से है, जिसे उस इकाई की सभी लागतों के एकत्रीकरण की दृष्टि से चुना जाता है। यह इकाई एक उत्पाद, एक सेवा, प्रभाग, विभाग, वर्ग संयन्त्र एवं मशीनरी का एक समूह, कर्मचारियों का एक समूह या विभिन्न इकाइयों का एक संयोजन हो सकता है। यह एक बजट केन्द्र भी हो सकता है।

लागत केन्द्र एक विस्तृत शब्द है और इसके अन्तर्गत उत्पादन विभाग, क्रियाएं, मशीन केन्द्र, बिक्री के क्षेत्र, गोदाम, व्यक्ति आदि जिसकी भी लागत ज्ञात करती हो, सम्मिलित किये जाते हैं। लागत केन्द्र का वर्गीकरण निम्न प्रकार किया जा सकता है:

  1. प्रक्रिया लागत केन्द्र (Process cost Centre) – प्रक्रिया लागत केन्द्र वह है, जिसमें विशिष्ट प्रक्रिया या संक्रियाओं (operations) का निरन्तर अनुक्रम नियमित आधार पर चलता है। इस प्रकार प्रक्रिया केन्द्र में लागत को संक्रियाओं के क्रम में निर्धारित और सम्बन्धित किया जाता है: जैसे तेलशोधन, स्टील रोलिंग, रसायन उद्योग।
  2. उत्पादन लागत केन्द्र (Production Cost Centre) – उत्पादन लागत केन्द्र वह है, जिसमें उत्पादन क्रियाओं से कच्चे माल को तैयार माल के रूप में परिवर्तित किया जाता है। इन केन्द्रों में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार की लागतें होती है।
  3. सेवा लागत केन्द्र (Service Cost Centre) – सेवा लागत केन्द्र वह है जो, अन्य लागत केन्द्रों को सेवाएं प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए स्टोर विभाग, शक्ति विभाग, आन्तरिक यातायात विभाग, मरम्मत व अनुरक्षण विभाग इत्यादि। इन केन्द्रों में केवल अप्रत्यक्ष लागतें होती है और सामान्यतः विक्रय योग्य उत्पादों का इन केन्द्रों द्वारा हस्तन नहीं किया जाता।
  4. अव्यक्तिगत लागत केन्द्र (Impersonal Cost Centre) – अव्यक्तिगत लागत केन्द्र वह है, जिसमें एक स्थान (Location) या उपकरण का मद (या इनका समूह) शामिल होता है।
  5. व्यक्तिगत लागत केन्द्र (Personal Cost Centre) – व्यक्तिगत लागत केन्द्र वह है, जिसमें एक व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह शामिल होते हैं। यह केन्द्र उपक्रम में संगठन के ढांचे पर निर्भर करता है। इस सन्दर्भ में लागत विश्लेषण कारखाना प्रबन्धन, विक्रय प्रबन्धक इत्यादि के आधार पर किया जा सकता है।
  6. संक्रिया लागत केन्द्र (Operation Cost Centre) – संक्रिया लागत केन्द्र वह है, जिसमें वे मशीनें तथा/अथवा व्यक्ति जो एक ही प्रकार की संक्रियाओं में संलग्न है, सम्मिलित होते हैं।

लागत इकाई (Cost Unit)

  1. ‘‘एक लागत इकाई उत्पाद, सेवा (अथवा इनके संयोग) की मात्रा की एक इकाई है जिसके लिए लागत ज्ञात की जा सके अथवा स्पष्ट की जा सके।‘‘
  2. ‘‘लागत इकाई उत्पादन या सेवा की मात्रा मापन का एक प्रकार है। इसे सामान्यतः उद्योग विशेष की सुविधा या अभ्यास के आधार पर अपनाया जाता है।‘‘
  • उपकार्य (Job) – एक वह लागत इकाई है जो कि एक एकल आदेश (अथवा ठेका) से बनती हैं।
  • बैच या समूह (Batch) – एक वह लागत इकाई है जो कि ऐसी अभिन्न मदों के समूह से बनती है जो कि उत्पादन की एक या अधिक अवस्थाओं पर नितान्त अपना सारूप्य बनाये रखती है।
  • उत्पाद समूह (Product Group) – एक वह लागत इकाई है जो कि समान उत्पादों के समूह से बनती है।

हम उत्पादित माल अथवा प्रदत्त सेवा की न केवल कुल लागत (total cost) ही निकालते हैं वरन् प्रति इकाई लागत (per unit cost) भी ज्ञात करते हैं। उत्पादित माल या प्रदत्त सेवा के मानक माप को इकाई कहते हैं। इकाई दो प्रकार की होती है:

(1) साधारण — साधारण इकाई के उदाहरण है: प्रति टन, प्रति मीटर, आदि।

(2) संयुक्त — संयुक्त इकाई के उदाहरण हैरः प्रति यात्री किलोमीटर, प्रति टन किलोमीटर, आदि।

लाभ केन्द्र (Profit Centre)

सामान्य अर्थ में लाभ केन्द्र का आशय ऐसे केन्द्र से होता है जो व्यवसाय में किसी उत्पाद या अन्य किसी क्रिया पर अधिकतम लाभ अर्जित करने के विभिन्न स्रोतों एवं उपायों पर विचार करता है तथा उनके लिए उत्तरदायी होता हैं। इस उद्देश्य के लिए वह केन्द्र बाजार सर्वेक्षण करता है, प्रचार के लिए क्षेत्रों का निर्धारण करता है, विक्रय नीतियों के निर्धारण में सहायता करता है तथा उसी या कम लागत पर उत्पाद में अधिक उपयोगिता के लिए सुझाव देता है।

लागत केन्द और लाभ केन्द्र में अन्तर (Difference between Cost and Profit Centre)

  1. आशय- लागत केन्द्र वह है, जिसकी लागत का निर्धारण किया जाना है जबकि लाभ केन्द्र अधिकतम लाभ के लिए उत्तरदायी होता है तथा आगम एवं व्यय दोनों पर विचार करता है।
  2. उत्तरदायित्व- लागत केन्द्र लागत के लेखांकन एवं नियन्त्रण के लिए उत्तरदायी होता है, जबकि लाभ केन्द्र लाभ लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए आवश्यक उपाय अपनाने पर ध्यान देता है।
  3. सम्बन्ध- लागत केन्द्र का बाजार, सर्वेक्षण, विक्रय सम्वर्द्धन इत्यादि से बहुत कम सम्बन्ध होता है, जबकि लाभ केन्द्र इनसे विशेष रूप से सम्बन्ध होता है।
  4. स्वायत्तता- लाभ केन्द्र उच्च प्रबन्ध के निर्देशन में कार्य करता है और अनेक बार स्वायत्तशासी होता है, जबकि लागत केन्द्र को स्वायत्तता नही होती।

लागत लेखांकन का विकास (Development of Cost Accounting)

लागत लेखांकन प्रमुख रूप से 20 सदी की देन है कहा जाता है कि ईसा से 5,000 वर्ष पूर्व मेसोपोटामिया में यह लेखा पद्धति अविकसित रूप से लागू थी तथा मध्ययुग में फ्लोरेन्स में कुछ अविकसित रूप से चलती थी। इसका कुछ वर्णन 1832 में प्रकाशित प्रोफेसर चाल्स बेवेज की पुस्तक (The economy of Machinery and Manufacture) से मिलता है।

लागत लेखांकन का जन्म व विकास निम्नलिखित कारणों से हुआ हैः-

  1. यूरोप की औद्योगिक क्रान्ति
  2. विवेकीकरण तथा वैज्ञानिक प्रबन्ध
  3. व्यावसायिक प्रतिस्पद्धा
  4. विश्वव्यापी युद्ध
  5. मूल्य नियन्त्रण
  6. राज्य सहायता व सरकारी नितियां।

उपर्युक्त कारणों से यह आवश्यक समझा गया कि सीमित साधनो से कम लागत पर वस्तुओ का उत्पादन किया जाय और इसके लिए लागत सम्बन्धी लेखे रखे जायें।

लागत लेखांकन का भारत मे विकास

भारत मे लागत लेखांकन की व्यवस्था कोई ज्यादा पुरानी नहीं हैं। स्वतन्त्रता से पूर्व भारत में औद्योगिक विकास का अभाव था।

सन् 1944 ई0 में इण्डियन इन्स्टीट्यूट ऑफ काॅस्ट एण्ड वर्कस (I.I.C.W) का जन्म एक गारन्टी द्वारा सीमित कम्पनी के रूप में हुआ। यह कम्पनी लागत लेखांकको की परीक्षा लिया करती थी और सफल लागत लेखांककों को प्रमाण-पत्र दिया करती थी।

स्वतंन्त्रता के पश्चात सन् 1947 में आद्योगिक नीति के विकास के द्वारा औद्योगिक विकास को बल मिला और इस कारण भारत मे लागत लेखांकन का विकास हुआ सन् 1959 में कास्ट एण्ड वक्र्स एकाउन्टेण्ट ऐक्ट भारत सरकार द्वारा पारित किया गया और तत्पश्चात इन्स्टीट्युट ऑफ कास्ट एण्ड वर्कस एकाउन्टेण्ट आफ इण्डिया (I.C.W.A.I) के रूप में एक स्वतन्त्र उपक्रम जिसका प्रधान कार्यालय कोलकाता में स्थापित किया गया।

कम्पनी अधिनियम 1956 में परिवर्तन करके लागत लेखांकन करना व उसका अंकेक्षण करने का प्रावधान किया गया वर्तमान में भारत सरकार द्वारा 44 उत्पादो से सम्बन्धित उद्योगों को लागत लेखांकन बनाना व उनका अंकेक्षण कराना अनिवार्य कर दिया गया हैं।

सारांश (Summary)

लागत लेखांकन के अन्तर्गत किसी वस्तु की प्रति इकाई लागत तथा कुल लागत ज्ञात करना सिखाया जाता है तथा लागत विश्लेषण किया जाता हैं। इसके अन्तर्गत कच्चे माल की लागत, अर्द्ध निर्मित माल की लागत तथा निर्मित माल की लागत ज्ञात की जाती है। केवल वस्तु की लागत ही ज्ञात करना नहीं, बल्कि सेवाओं की लागत ज्ञात करना भी सिखाया जाता है। परिचालन लागत लेखांकन के अन्तर्गत सेवाओं की लागत ज्ञात की जाती है। जब हमें किसी वस्तु या सेवा की लागत ज्ञात हो जाती है तो इस लागत में अपेक्षित लाभ को जोड़कर वि0मू0 निर्धारित की जाती है। लागत लेखांकन वित्तीय लेखांकन का स्थानापन्न न होकर, पूरक होता है।

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